रविवार, 4 नवंबर 2007

मेरी दिल्ली यात्रा

मुझे दिल्ली जाने का मौका कभी कभी मिलता है । वैसे चैनल वाले आजकल स्वर्ग की यात्रा कर कर रहे है और संजीवनी बूटी लाने का मार्ग खोज रहे है । अपना अभी चांस नही लगा है । हम बात दिल्ली यात्रा की कर रहे थे । जब मैं 6 साल का था तब पहली बार गया था । दूर के एक रिश्तेदार संसद भवन मे एकाउंटेंट थे । उनके बेटे की शादी मे जाने का मौका मिला था। लोधी रोड पर सरकारी कॉलोनी मे ५ दिन की मस्ती । सरकारी अम्बसेदर कार पर उन्होने पूरा दिल्ली घुमा दिया था तब। कुतुब मीनार मे ऊपर जाने को भी मिल था। प्यारी दिल्ली , एकदम शांत दिल्ली , हरी भरी दिल्ली , आराम से सड़क पर कर लेते थे हम। दूध मदर डेरी की बोतल मे मिलता था लेकिन तब सिंथेटिक होने का टेंशन नही था। बात 1977 की थी, अब बात 2007 यानी की 30 साल बाद की दिल्ली की यात्रा। इस बार हम अपनी कार से थे। रिश्तेदार का पता भूल गए थे इसलिए बदली दिल्ली मे हम उस जगह को ही खोज नही पाए। सोचा था की कुछ खरीदेंगे मगर कार पार्किंग की जगह मिलने मे ही रात के दस बज गए। कुछ लोगो के यहाँ गए। ज्यादातर घरो मे तालो के दर्शन हो पाए। मिया बीबी दोनो काम पर गए होंगे। पूरा दिन सड़क पर ही बीत गया। कोई क्रॉसिंग नही मिली। पेटी बांधे सिर्फ आगे की ओर भागते रहो। हर कोई भाग रहा है। याद आ गयी पुरानी कहानी आसमान गिर रहा है भागो। दो दिन मे पूरे ४५०० रुपी खर्च कर चुका था। मगर किसी ने नमस्ते तक नही की। अपने नगर मे ऐसा नही होता। घर से निकलने से वापिस आने तक सौ पचास लोग तो सलाम ठोक ही देते है। रात मे चांदनी चौक से बॉर्डर क्रॉस करने मे ही तीन घंटे लग गए। रेड लाइट जलती बुझती रही और हम कछुए की चाल से से चलते रहे। अचानक बदबू आई तो पता चला की हम दिल्ली के गाजीपुर इलाके मे पहुँच गए है। चारो तरफ बोर्ड लग गए है। पता पूछने का झंझट नही है। शीला जी के फोटो वाले खुशहाल दिल्ली की पट्टी भी दिखी थी। ये चैनल वाले यो ही ब्लू ब्लू चिल्लाते है। हमारे उत्तर प्रदेश मे तो रोज ही जुगाड़ वाले और पहले साइकिल वाले और अब हाथी वाले झंडे लगाए जीपे रोज ही दो सैकडा जगह सड़क रेड रेड कर देते है। लगता है महानगरों मे रहने वाले वाले इन्सान की टी आर पी ज्यादा है। चैनल वाले भूल जाते है शीला जी दिल्ली की नही उत्तर प्रदेश की है। concrete के जंगल के सिवा कुछ भी हमसे ज्यादा नही था। अलबत्ता सब कुछ कम था। प्यार, मेहमान नवाजी, तक्लूफ़, और समय ये सब दिल्ली मे कम है लोगो के पास। चौबीस घंटे मे आठ घंटे तो सड़क नापने मे ही खर्च हो जाता है . आठ घंटे ड्यूटी और बचे आठ घंटे मे सोना फुनियाना और जरूरी काम। khair हमारे मित्र ने रात मे barah बजे hame एक गोली दी और कहा इसे kha lo neend aa jayegi.

गुरुवार, 27 सितंबर 2007

खबरों की खबर

बिना पैसे के खबर पाने की जुगाड़ एक दिन इन खबरिया चैनेलों की हवा निकाल देगी । इन्टरनेट और अखबारों मे आये दिन citizen रिपोर्टर बनने के सपने परोसे जाते है । अगर कैमरा है तो ठीक वरना मोबाइल कैमरा काम कर जाता है । किसी के भी कहीँ के मारपीट या प्रेमी युगुल का फोटो खींचा और भेज दिया । viewer अलर्ट मे इनाम भी पा गए । झूठ के पुलिंदों से भरे ब्रेकिंग न्यूज़ । मुझे याद है कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के एक गांव मे एक गरीब बाप की बेटी की लाश की इन खबर्चिओं ने १३ लाख मे बोली लगवा दी । अक्सर नाग और नागिन की लडाई दिखाने वाले एक चैनल ने लाइव ओ वी खडी करवा दी । अगले दिन अपने अपको सबसे तेज चैनल कहाने वाले टी वी चेंनेल के पत्रकार भी दिल्ली से मैनपुरी मे आ धमके । visual कुछ थानही अलबत्ता २४ घंटे के बाद खबर की हवा निकल गयी । २ साल पुरानी लाश को कोई १ महिने पुरानी बता रह था कोई १ हफ्ते पुरानी । साप और साड वाले चैनल का रिपोर्टर इन्टर मे पढ़ रह है और १० १२ लड़को को साथ ले कर घूमता है । उसके मुताबिक कुछ ही दिनों मे वो एडिटर बनने वाला है साथियो को पत्रकार बना कर ही दम लेगा। उसे तो सनसनी मे मज़े लेने थे । पत्रकारिता की एथिक्स पर काम करने वाले हैदराबाद के चैनल के पत्रकार रोते रह गए । टी आर पी कोई और मार ले गया। देश के सबसे पुराने प्रायवेट न्यूज़ चैनल के पत्रकार को भी लाश पर फोनो देना ही पड़ा। बेचारा बार बार अपने सीनियर को बता रहा था की खबर फर्जी है एक no १ अख़बार ने खबर छाप दी थी। मगर शायद नौएडा वाले कुछ भी सुनने को तैयार नही थे। हकीकत जैसी खबर वैसी की ऐसी की तैसी । सब दिखा रहे है तुम भी भेजो ॥ अब लाश को पुलिस रखा रही है। और रतिराम को पुलिस के चक्कर लगाने पढ़ रहे हैं। साप वाले पत्रकार किसी चौराहे पेर खडे हो कर school जाने वाली लडकी के साथ हरकत करवा रहे है और मोबाइल पेर उसकी तस्वीर चैनल के लिए तैयार कर रहे है।